रेगिस्तान का सूरज डूब चुका था, लेकिन शेख अब्दुल्लाह अल-रशीद के महल में गर्मी अभी भी हवा में तप रही थी। दोपहर को शेख ने ऊंट का ताज़ा, मसालेदार गोश्त खाया था – भारी मात्रा में, लहसुन, अदरक, काली मिर्च और खास जड़ी-बूटियों के साथ। वो गोश्त सिर्फ़ पेट नहीं भरता था, बल्कि पुरानी अरबी लोककथाओं के अनुसार उसमें वो जादुई शक्ति होती थी जो मर्द की नसों में आग भर देती है। शेख का लिंग पहले से ही भारी था, लेकिन गोश्त खाने के एक घंटे बाद ही वो पत्थर की तरह खड़ा हो गया। नसें फूल गईं, सिर चमकने लगा, और हर ५ मिनट में बिना छुए ही सख्त होकर काँपने लगता। शेख ने अपना वज़ीर बुलाया और हुक्म दिया, “आज रात मुझे बिल्कुल ताज़ी, १८ साल की कुंवारी लड़की चाहिए। वो जिसकी चूत कभी किसी लिंग से टकराई ही न हो।”
रात के ठीक १० बजे महल के शयनकक्ष का भारी दरवाज़ा खुला। कमरा विशाल था – दीवारें मोटे मखमली पर्दों से ढकी, फर्श पर ईरानी गलीचे बिछे, छत से सोने की लालटेनें लटक रही थीं जिनकी रोशनी सुनहरी थी। बीच में एक राजसी बिस्तर था, जिस पर ७-८ मोटी रेशमी चादरें और तकिए बिछे थे। हवा में अगरबत्ती और गुलाब का ख़ुशबू था।
दो सिपाही एक लड़की को दोनों बाज़ुओं से पकड़े अंदर लाए। लड़की का नाम लैला था। १८ साल की, बदू कबीले की, गोरी-दूधिया रंग, लंबे घने काले बाल कमर तक, बड़ी-बड़ी काली आँखें जिनमें अब डर और आँसू भरे थे। उसका बदन नाजुक, कमर पतली, कूल्हे थोड़े भरे, और स्तन बड़े-बड़े, भारी, जो उसके सफेद घाघरे के अंदर भी उभरे हुए दिख रहे थे। उसके होंठ गुलाबी और काँप रहे थे। वो पूरी तरह कुंवारी थी – आज तक किसी मर्द ने उसे छुआ तक नहीं था।
सिपाहियों ने उसे कमरे के बीच में खड़ा कर दिया और बाहर निकल गए। दरवाज़ा भारी आवाज़ के साथ बंद हो गया।
शेख अब्दुल्लाह दरवाज़े के पास खड़ा था। सिर्फ़ एक सफेद रेशमी जुलाब पहने, जिसके नीचे उसका १० इंच लंबा, मोटा लिंग पहले से ही तना हुआ था और कपड़े को टेंट की तरह उठाए हुए था। उसकी आँखें भूख से जल रही थीं।
“आओ मेरी छोटी कुंवारी… आज ऊंट का गोश्त खाया है मैंने। दस घंटे तक मेरा लिंग नहीं रुकेगा। सात बार तुझे चोदूँगा, हर बार अलग-अलग तरीके से। जितना रोना है, जितना चीखना है, चीखो। आज ये कमरा तेरी चीखों, रोने और मेरी साँसों से भर जाएगा।”
लैला काँपते हुए पीछे हटी, “नहीं शेख साहब… मैं अभी बहुत छोटी हूँ… मुझे छोड़ दीजिए… मैं डर रही हूँ… रो रही हूँ… प्लीज…” उसके गालों पर आँसू बहने लगे।
शेख आगे बढ़ा, उसका भारी शरीर लैला के नाजुक बदन के सामने और भी विशाल लग रहा था। उसने लैला का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर की तरफ खींच लिया।
### राउंड १ – कुंवारी चूत का फटना (रात १०:०० से ११:३० तक – १.५ घंटे)
शेख ने लैला को बिस्तर पर जोर से धकेला। लैला पीठ के बल गिर गई, उसके बाल बिखर गए। शेख ने उसके घाघरे की डोरी खींची – एक झटके में घाघरा फटकर अलग हो गया। नीचे सिर्फ़ पतली सफेद सिल्क की पैंटी थी। शेख ने उसे भी दोनों हाथों से फाड़ दिया। लैला की कुंवारी चूत अब पूरी तरह नंगी – गुलाबी, छोटी, बिल्कुल साफ़, बिना एक बाल के, और अभी तक अनछुई।
“कितनी सुंदर है तेरी चूत… आज इसे मैं फाड़ दूँगा,” शेख गुर्राया।
लैला दोनों हाथों से अपनी चूत ढकने लगी और जोर-जोर से रोने लगी, “नहीं! नहीं! ये बहुत बड़ा है… मुझे मार डालेगा… आह… रो रही हूँ… चीख रही हूँ… माँ बचाओ…”
शेख ने उसके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए। फिर उसने लैला के भारी स्तनों को दोनों हाथों में भर लिया और जोर-जोर से मसलने लगा। मुँह से एक-एक निप्पल चूसने लगा – दाँतों से काटते हुए। लैला तड़प उठी, “आआआह… दर्द हो रहा है… स्तन फट रहे हैं… छोड़ो… मैं रो रही हूँ… बहुत रो रही हूँ…”
शेख ने अपनी जुलाब उतारी। उसका लिंग बाहर आया – १० इंच लंबा, २.५ इंच मोटा, नसें फूली हुईं, सिर चमकता हुआ और पहले से ही रस टपक रहा था। उसने लिंग का सिर लैला की चूत पर रखा और धीरे-धीरे दबाया।
लैला की आँखें फट गईं। “नहीं! निकालो! ये तो फाड़ रहा है! आआआह!!! चीख रही हूँ!!! रो रही हूँ!!! दर्द… बहुत दर्द… मर जाऊँगी!!!”
शेख ने एक जोरदार झटका मारा। आधा लिंग अंदर चला गया। कुंवारी झिल्ली फटी और खून की धार निकल आई। लैला पागलों की तरह चीखने लगी, सिर इधर-उधर पटकने लगी, शरीर काँपने लगा। “मर गई! मर गई! निकालो शेख… प्लीज… मैं कुंवारी थी… अब नहीं रही… रो-रो के मर रही हूँ…”
शेख रुका नहीं। दूसरा जोरदार झटका। पूरा १० इंच अंदर चला गया। लैला की चीख आसमान छू गई। “आआआह!!! पेट फट गया!!! चीख रही हूँ!!! रो रही हूँ!!! दया करो!!!”
शेख ने धीमी लेकिन गहरी गति से चोदना शुरू किया। हर थ्रस्ट पर लैला की चूत से खून और रस का मिश्रण निकलता। वो लगातार चीखती, रोती, गिड़गिड़ाती रही – “आह… उफ… धीरे… बहुत बड़ा है… मेरी चूत फट गई… शेख… बचाओ मुझे…” ५५ मिनट तक शेख लगातार पेलता रहा। लैला की आवाज़ बैठ गई, लेकिन आँसू अभी भी बह रहे थे। आखिरकार शेख ने पहला जोरदार झटका मारा और गर्म-गर्म वीर्य की मोटी धार लैला की चूत के अंदर तक भर दी। लैला काँप उठी, “गर्म… अंदर… भरा जा रहा है… रो रही हूँ…”
### राउंड २ – डॉगी स्टाइल में जंगली पेलाई (११:३० से १:१० तक – १ घंटा ४० मिनट)
शेख ने लैला को पलटा, घुटनों के बल मोड़ा। लैला की चूत अब सूजी हुई, लाल और खुली हुई थी। शेख ने पीछे से एक झटके में पूरा लिंग घुसा दिया। लैला फिर चीख पड़ी, “फिर से!!! फिर दर्द!!! आआह!!! रो रही हूँ!!! चीख रही हूँ!!!”
Leave a Reply