तीन बहुओं का घोड़ा 7

अध्याय 7: मालदीव्स – पहली बार गांड की सजा (बिना मर्जी के)

अगले दिन सुबह 11 बजे। मालदीव्स का विला अभी भी नीली रोशनी में चमक रहा था। प्रिया और नेहा दोनों पिछले रात की चुदाई से थोड़ी थकी हुई थीं, लेकिन अब उन्हें मजा आ रहा था। दोनों ने बिकिनी पहनी थी और ब्रेकफास्ट कर रही थीं।

विक्रम अचानक उनके पीछे आया। उसका लंड पहले से ही खड़ा था। उसने दोनों की बिकिनी नीचे खींच दी और सीधे कहा, 
“आज तुम दोनों की गांड लूंगा… पहली बार… और बिना पूछे।”

प्रिया चौंक गई, “नहीं विक्रम… गांड में कभी नहीं… वो बहुत टाइट है… प्लीज… मत करो… मैं डर रही हूँ…” 
नेहा भी कांप उठी, “जी… प्लीज… चुत में ही कर लो… गांड फट जाएगी… मैं नहीं सह पाऊंगी…”

विक्रम ने दोनों को बाल पकड़कर बेड पर झुका दिया। पहले प्रिया। उसने कंडोम लगाया, लंड पर बहुत सारा लुब्रिकेंट लगाया, लेकिन फिर भी मोटा सिर देखकर प्रिया चीख पड़ी।

“नहीं… विक्रम… वहाँ मत… प्लीज रुक जाओ… मेरी गांड में नहीं जाएगा… आआह्ह… दर्द… निकालो… बहुत मोटा है… फट रही है… आह्ह… आधा भी नहीं घुसा… प्लीज… मैं मना कर रही हूँ…” प्रिया रोते हुए चीखी।

विक्रम ने एक जोरदार धक्का मारा। पूरा 13 इंच का लंड प्रिया की गांड में घुस गया। प्रिया की आँखें बाहर निकल आईं। 

“आआआआह्ह्ह… नहीं… मेरी गांड चीर दी… विक्रम… प्लीज निकालो… बहुत दर्द हो रहा है… मैं मर जाऊंगी… आह्ह… रुक जाओ… बिना मर्जी के मत करो…” 

विक्रम ने प्रिया की कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोकना शुरू कर दिया। पच… पच… पच… गांड की चुदाई की आवाज पूरे विला में गूंज रही थी। प्रिया रो रही थी, लेकिन विक्रम 25 मिनट तक लगातार चोदता रहा। प्रिया की गांड सूज गई, लाल हो गई।

फिर नेहा की बारी। 
“नहीं… मेरी बारी मत… दीदी की तरह मत करो… प्लीज विक्रम जी… मैं नई-नई दुल्हन हूँ… गांड में मत… आआह्ह… फट गई… पूरा अंदर… दर्द… रुक जाओ… मैं रो रही हूँ…” 

विक्रम ने नेहा को भी बिना रुके चोदा। दोनों की गांड पहली बार फाड़ी जा रही थी।

दो दिन तक का सिलसिला

अगले 2 दिन विक्रम ने दोनों को बिना उनकी मर्जी के गांड मारी। दिन में 4-5 बार, रात में 5-5 बार — कुल 10-10 बार हर एक की।

– सुबह पूल में 
– दोपहर बालकनी में 
– शाम जकूजी में 
– रात बेड पर अलग-अलग पोजीशन — डॉगी, स्पूनिंग, स्टैंडिंग 

प्रिया हर बार चीखती, 
“नहीं… बस… अब मत… मेरी गांड फट चुकी है… 6 बार हो चुका… प्लीज विक्रम… चल नहीं पा रही… आह्ह… फिर से… बहुत दर्द… मैं मना कर रही हूँ… रुक जाओ…” 

नेहा और भी ज्यादा रोती, 
“विक्रम जी… प्लीज… मेरी गांड में अब कुछ नहीं बचा… सूज गई है… आआह्ह… 8वीं बार… निकालो… मैं उठ भी नहीं सकती… बिना पूछे मत मारो… मैं तेरी पत्नी हूँ… आह्ह… दर्द…”

दूसरे दिन शाम तक दोनों की हालत बेहद खराब हो गई। दोनों की गांडें बुरी तरह सूजी हुईं, लाल, चलने में असमर्थ। वे बिस्तर पर पड़ी कराह रही थीं। बैठ नहीं पा रही थीं, पैर कांप रहे थे। चुत भी बार-बार चुदाई से सूज गई थी।

विक्रम ने प्राइवेट जेट बुलाया। दोनों को स्ट्रेचर पर लिटाकर जेट में लादा गया। उड़ान भरते समय भी दोनों दर्द से तड़प रही थीं।

प्रिया ने कमजोर आवाज में कहा, “विक्रम… अब काफी… हम दोनों की गांड खराब कर दी… चल नहीं पा रहे… घर ले चलो…” 
नेहा सिर्फ रो रही थी, कुछ बोल भी नहीं पा रही थी।

प्राइवेट जेट में विक्रम ने फिर से दोनों की गांड में उंगली डालकर खेला, लेकिन पूरा लंड नहीं डाला। दोनों बस कराहती रहीं।

घर पहुंचने पर

घर आकर दोनों को सीधे बेडरूम में लिटाया गया। दोनों नंगी पड़ी थीं, गांड पर बर्फ के पैक लगाए हुए। चलने की हिम्मत नहीं थी।

शीला माँ (प्रिया की माँ) उन्हें देखकर बोलीं, “बेटी… क्या हालत बना दी तुम दोनों की… अब मैं भी नहीं आ सकती… तुम दोनों ही संभालो… लेकिन सावधानी से…” 

प्रिया और नेहा दोनों एक-दूसरे को देखकर रो पड़ीं। उनकी गांडें 2 दिन की बिना मर्जी वाली चुदाई से बुरी तरह खराब हो चुकी थीं। लेकिन विक्रम संतुष्ट मुस्कान के साथ बेड के पास बैठा था।

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