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Exit (Under 18)

ट्रेन में मिली अजनबी लड़की 1

गोवा जा रही थी। 1st AC का प्राइवेट केबिन — सिर्फ दो बर्थ। ऊपरी बर्थ पर मैं (राहुल, 32 साल) बैठा था। लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, लेकिन मन कहीं और था। नीचे वाली बर्थ पर एक लड़की बैठी हुई थी — नेहा। उम्र करीब 28-29। गोरी, लंबे काले बाल, हल्की-सी मुस्कान और आँखों में वो चमक जो ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए भी अंदर तक उतर जाती थी।

ट्रेन दिल्ली से छूटते ही हमारी नज़रें मिलीं।

“हाय… मैं नेहा,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “दिल्ली से गोवा… अकेली ट्रैवल कर रही हूँ।”

मैंने भी मुस्कुराकर जवाब दिया, “राहुल… वही हाल। सोलो ट्रिप।”

पहले तो बातें हल्की-फुल्की थीं — काम, मौसम, गोवा के प्लान। लेकिन जैसे-जैसे रात ढलती गई, बातें गहरी होती गईं। नेहा ने बताया कि वो सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, मुंबई में जॉब करती है, लेकिन दिल में घूमने का शौक है। मैंने अपनी स्टार्टअप की कहानी सुनाई। हम दोनों हँसते रहे। चाय आई, हमने साथ में पिए। रात के 12 बजे तक हम दोनों केबिन में बैठे गप्पें मार रहे थे।

ट्रेन की हल्की-सी लहर और बाहर की अंधेरी रात… नेहा की हँसी में एक अजीब सा जादू था। मैंने देखा कि वो बार-बार मेरी तरफ देख रही है। मैं भी छुप-छुपकर उसकी आँखों में देख रहा था।

“तुम बहुत अच्छे लगते हो बात करने में,” उसने शरमाते हुए कहा।
“तुम भी… सच में,” मैंने जवाब दिया।

उस रात हम दोनों थक गए थे, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मैंने नीचे उतरकर उसके बर्थ के पास बैठ गया। हमने हेडफोन शेयर किए, एक ही गाना सुनते रहे — “तुम ही हो”। उसकी कंधे मेरे कंधे से छू रहे थे। हल्की-सी ठंडी हवा केबिन में घुस रही थी। हम बस एक-दूसरे के पास बैठे रहे, बातें करते रहे। कोई टच नहीं, बस वो गर्माहट… वो अनकही केमिस्ट्री।

सुबह गोवा स्टेशन पर हम साथ उतरे।

“अकेले घूमने का मजा नहीं आएगा,” मैंने कहा।
नेहा मुस्कुराई, “तो फिर साथ घूमें?”

हमने तय किया — एक ही होटल में बुकिंग, लेकिन दो अलग-अलग रूम। मैंने ऑनलाइन दो रूम बुक कर दिए — दोनों बिलकुल पास-पास, बालकनी से एक-दूसरे को देख सकते थे।

पहला दिन — हमने कैलंगुट बीच पर घूमना शुरू किया। पानी में पैर डुबोए, फोटो खिंचवाईं, नारियल पानी पिया। नेहा का हँसना सुनकर मैं बार-बार मुड़ जाता। दोपहर में हमने पुराने गोवा के चर्च घूमे। शाम को पणजी के बाजार में घूमते हुए उसने मेरे हाथ में अपना हाथ डाल दिया। बस हल्का-सा… लेकिन दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

दूसरा दिन और भी खूबसूरत। हम दोनों अंजुना बीच गए। सूरज ढल रहा था। नेहा ने सफेद ड्रेस पहनी थी जो हवा में लहरा रही थी। हम बालू पर बैठे, सूरजास्त देखा। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने धीरे से उसके बालों में हाथ फेरा। कोई बात नहीं हुई… बस सन्नाटा और समंदर की लहरें।

शाम को होटल लौटे।

रात के 11:30 बजे थे। मैं अपने रूम में था। बालकनी में खड़ा समंदर की आवाज सुन रहा था। तभी मेरा फोन बजा — नेहा का मैसेज:

“नींद नहीं आ रही… तुम्हारे रूम में आ जाऊँ? सिर्फ बातें करेंगे 😊”

मैंने तुरंत रिप्लाई किया — “आ जाओ… दरवाजा खुला है।”

दो मिनट बाद दरवाजा धीरे से खुला। नेहा हल्के गुलाबी नाइट सूट में थी। बाल खुले हुए, चेहरे पर हल्की शरम। वो अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया।

हम दोनों बालकनी में खड़े हो गए। हवा ठंडी थी। नेहा ने कहा, “दो दिन में कितना अच्छा लग रहा है राहुल… तुम्हारे साथ।”

मैंने मुड़कर उसे देखा। उसकी आँखों में चमक थी। मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और कहा, “मुझे भी… बहुत अच्छा लग रहा है नेहा।”

हम दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ गए। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं। मैंने धीरे से उसकी कमर पर हाथ रखा। नेहा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैंने आगे बढ़कर उसके माथे पर हल्का-सा किस किया। फिर उसकी नाक पर… फिर गाल पर।

“राहुल…” उसने फुसफुसाकर कहा और मेरी छाती पर सिर रख दिया।

मैंने उसे गले लगा लिया। उसकी गरमाहट मेरे शरीर में उतर रही थी। हम बस एक-दूसरे को कसकर गले लगाए खड़े रहे। कोई जल्दी नहीं थी। बस वो पल… वो closeness… वो normal romance।

नेहा ने धीरे से सिर ऊपर किया। हमारी नज़रें मिलीं। उसके होंठ हल्के से खुले हुए थे। मैंने धीरे-धीरे अपना चेहरा उसके चेहरे की तरफ ले जाया…

नेहा मेरी आँखों में देखकर कुछ पल चुप रही। उसके गाल हल्के गुलाबी हो गए थे। बालकनी की हल्की ठंडी हवा उसके खुले बालों को उड़ा रही थी। मैंने उसकी कमर पर हाथ रखे हुए थे और धीरे-धीरे उसकी पीठ सहला रहा था।

नेहा ने आखिरकार बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
“राहुल… मैं डर रही हूँ, लेकिन… मैं भी तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ आज रात। बस… बहुत धीरे-धीरे, ठीक है?”

मैंने मुस्कुराकर उसके माथे पर किस किया और फुसफुसाया,
“बिल्कुल धीरे-धीरे नेहा। जितना तुम चाहोगी, उतना ही। मैं कभी जल्दबाजी नहीं करूँगा।”

नेहा ने हल्के से सिर हिलाया और मेरी छाती से लग गई। मैंने उसे कसकर गले लगा लिया। फिर धीरे से उसे अंदर रूम की तरफ ले आया। रूम में सिर्फ एक हल्की गोल्डन लाइट जल रही थी, जिससे पूरा कमरा रोमांटिक लग रहा था। खिड़की से समंदर की दूर की आवाज़ आ रही थी।

हम दोनों बिस्तर के किनारे बैठ गए। नेहा की साँसें थोड़ी तेज़ थीं। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और उँगलियों को आपस में फंसाया। कुछ देर हम बस ऐसे ही बैठे रहे, एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए।

फिर मैंने धीरे से उसकी तरफ झुका और उसके होंठों को फिर से चूमा। ये किस पहले से ज्यादा गहरा और लंबा था। नेहा ने भी जवाब दिया। उसके होंठ नरम और गर्म थे। हमारी जीभें हल्के-हल्के छूने लगीं। किस के दौरान मैंने एक हाथ से उसके बालों को सहलाया, दूसरे हाथ से उसकी कमर को पकड़ रखा था।

किस खत्म होने पर नेहा ने शरमाते हुए कहा,
“राहुल… मेरी ड्रेस…”

मैंने धीरे से उसके कंधे से ड्रेस की पट्टियाँ सरकाईं। ड्रेस धीरे-धीरे नीचे खिसकती गई और उसके गोरे, नरम कंधे बाहर आ गए। मैंने ड्रेस को और नीचे खींचा। अब नेहा सिर्फ़ काले रंग की ब्रा और पैंटी में थी। उसकी छातियाँ भरी हुई थीं और ब्रा के अंदर हल्के-हल्के उभर रही थीं। उसकी कमर पतली थी और जाँघें गोल और नरम दिख रही थीं।

नेहा ने शरमा कर अपनी बाँहें छाती पर रख लीं। मैंने मुस्कुराते हुए उसके हाथ हटाए और बोला,
“तुम बहुत सुंदर हो नेहा… डरो मत।”

फिर मैंने अपनी शर्ट के बटन एक-एक करके खोले और उतार दी। अब मैं सिर्फ़ ट्राउज़र में था। नेहा ने मेरी छाती पर हाथ रखा और धीरे-धीरे सहलाने लगी। उसकी उँगलियाँ मेरे शरीर पर घूम रही थीं। मैंने उसे फिर से किस किया — इस बार गर्दन पर, कंधे पर, फिर क्लेविकल बोन पर। हर किस के साथ नेहा की साँसें भारी होती जा रही थीं।

मैंने धीरे से उसकी ब्रा का हुक खोला। ब्रा ढीली हो गई और मैंने उसे उतार दिया। नेहा की दोनों छातियाँ पूरी तरह बाहर आ गईं — गोल, भरी हुई, हल्के ब्राउन निप्पल्स के साथ। वे हल्के-हल्के हिल रही थीं। मैंने एक हाथ से उन्हें बहुत नरम तरीके से छुआ। उँगलियाँ उनके नरम मांस पर घूम रही थीं। नेहा की आँखें बंद हो गईं और उसके मुँह से हल्की सी आह निकली — “आह्ह… राहुल…”

मैंने झुककर एक निप्पल को होंठों से छुआ, फिर धीरे से चूसा। नेहा का शरीर काँप गया। मैं दूसरी छाती को हाथ से धीरे-धीरे मसल रहा था। नेहा ने मेरे सिर को अपने सीने से दबाया और बालों में उँगलियाँ फिराने लगी।

“राहुल… बहुत अच्छा लग रहा है…” उसने फुसफुसाकर कहा।

कुछ देर तक मैं उसकी छातियों को चूमता और सहलाता रहा। फिर मैंने धीरे से उसे बिस्तर पर लिटा दिया। अब नेहा सिर्फ़ पैंटी में थी। मैंने उसकी जाँघों पर हाथ फेरा, फिर पैंटी के किनारे पर उँगलियाँ चलाईं। नेहा ने शरमाते हुए जाँघें हल्की सी बंद कर लीं।

मैंने धीरे से उसकी पैंटी भी उतार दी। अब नेहा पूरी तरह नंगी मेरे सामने लेटी थी। उसकी चूत पर हल्के बाल थे, लेकिन बहुत साफ़ और गुलाबी दिख रही थी। मैंने उसकी जाँघों को धीरे से अलग किया। नेहा की साँसें अब बहुत तेज़ हो गई थीं।

मैंने भी अपनी ट्राउज़र और अंडरवियर उतार दी। मेरा लंड पहले से ही सख्त हो चुका था। नेहा ने उसे देखा और शरमा गई।

मैं बिस्तर पर उसके पास लेट गया। हम दोनों एक-दूसरे को कसकर गले लगाए हुए थे। नंगे शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे। मैंने उसे फिर से किस किया — होंठों पर, गर्दन पर, छातियों पर। मेरे हाथ उसकी पीठ, कमर, जाँघों पर घूम रहे थे। नेहा भी मेरी पीठ और कूल्हों को सहला रही थी।

धीरे-धीरे मैंने अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच ले जाया। उँगलियाँ उसकी चूत की फाँक पर घूमने लगीं। नेहा बहुत गीली हो चुकी थी। जब मैंने क्लिटोरिस पर हल्के से उँगली घुमाई, तो नेहा ने जोर से कराह मारी — “आह्ह… राहुल… धीरे…”

मैं बहुत धीरे-धीरे उँगली अंदर-बाहर करने लगा। नेहा की कमर उठ रही थी। उसकी साँसें फूल रही थीं। मैंने दूसरी उँगली भी डाल दी और धीरे से गति बढ़ाई। नेहा का पूरा शरीर सिहर रहा था।

कुछ देर बाद नेहा ने मेरी तरफ देखा और शर्माते हुए कहा,
“राहुल… अब…”

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