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दीदी की एनिवर्सरी ओर मेरी… 3

जीजू ने लंबी साँस छोड़ते हुए दीदी के बालों में हाथ फेरा और बोला,
“मजा आ गया ना बेबी?”

दीदी ने थकी हुई लेकिन संतुष्ट आवाज में जवाब दिया,
“बहुत मजे आए हैं आज तो।”

जीजू हल्का मुस्कुराया। उसने दीदी की गांड पर हल्के से थपथपाते हुए कहा,
“गांड मारने में तो उस दिन जितना मजा नहीं आया जो होटल में हाथ-पैर बाँध के मारी थी ना…”

दीदी की आँखें थोड़ी बंद हुईं। उसने साँस छोड़ते हुए कहा,
“उस दिन के बाद तो पंद्रह दिन ठीक से चल नहीं पाई थी। इतना दर्द हुआ था।”

मैं कैमरा थामे यह सुनकर अंदर तक चौंक गई। आज पहली बार साफ पता चला कि दीदी ने गांड सिर्फ आज नहीं मरवाई थी। पहले भी… होटल में… हाथ-पैर बाँधकर। मेरा दिल और तेज धड़कने लगा।

जीजू ने फिर कहा,
“एक राउंड तू पूरा लंड मुँह में लेकर चूस। पानी निकाल के पी जा। तब जाके चार राउंड पूरे होंगे। और वीडियो भी बंद कर देना।”

मुझे लगा दीदी मना कर देगी। इतनी देर की थकान के बाद, गांड सूजी होने के बाद… लेकिन दीदी ने मेरी तरफ देखा और साफ कहा,

“वीडियो ऑन कर।”

मैंने फिर से कैमरा चालू किया। हाथ काँप रहे थे।

दीदी उठकर जीजू के ऊपर सवार हो गई। उसने अपने बड़े स्तनों को दोनों हाथों से पकड़ा और लंड के चारों तरफ दबाने लगी। स्तनों के बीच लंड को ऊपर-नीचे रगड़ने लगी। क्रीम और पसीने की चमक के साथ लंड उसके स्तनों के बीच गायब हो रहा था और निकल रहा था। फिर उसने चेहरा नीचे किया और गालों से, होठों से लंड को सहलाने लगी। कभी जीभ निकाली, कभी सिर्फ साँस छोड़कर गर्म हवा छोड़ी।

फिर उसने मुँह पूरा खोला और लंड को अंदर ले लिया। इस बार वो सिर्फ चूस नहीं रही थी। जीजू ने उसके बाल पकड़ लिए और कमर ऊपर की। दीदी का गला भर गया। आँखों से आँसू आने लगे लेकिन उसने मुँह नहीं हटाया। जीजू जोर-जोर से मुँह में धक्के मारने लगा। गले तक लंड जा रहा था। दीदी की गलघोंटू आवाजें आ रही थीं – ग्लक… ग्लक… ग्लक…। लार बहकर उसकी ठुड्डी और स्तनों पर गिर रही थी।

एक घंटे तक यही सिलसिला चला। कभी दीदी खुद सिर ऊपर-नीचे करती, कभी जीजू उसके मुँह में जोर से पेलता। दीदी के गालों पर आँसू और लार मिलकर चमक रहे थे। आँखें लाल हो गई थीं। लेकिन वो रुकी नहीं। आखिर में जीजू की जाँघें तन गईं। उसने दीदी के सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और जोर से निकलने लगा। दीदी ने लंड को मुँह से नहीं निकाला। पूरा पानी उसके मुँह में जाता रहा। उसने गले से निगलना शुरू कर दिया। एक बूँद बाहर नहीं गिरने दी। जब जीजू का शरीर ढीला पड़ा तो दीदी ने लंड को धीरे से साफ किया और बाहर निकाला। होठ चमक रहे थे।

जीजू भारी साँसें लेते हुए बोला,
“बहुत बढ़िया… अब चार राउंड पूरे।”

दीदी ने सिर्फ सिर हिलाया। थकी हुई थी। दोनों कुछ देर चुपचाप लेटे रहे। बातें कम हुईं। बस हल्की साँसें और कभी-कभी एक-दूसरे को सहलाना।

मैंने कैमरा बंद कर दिया। मेरी हालत खराब थी। चूत बहुत देर से तड़प रही थी। पैंटी पूरी तरह गीली चिपक चुकी थी। मन कर रहा था अभी जाकर उँगली कर लूँ। मैंने धीमी आवाज में कहा,

“दीदी… नींद आ रही है। मैं बाहर सोफे पर सो जाती हूँ।”

दीदी ने आँखें खोलीं।
“यहीं बेड पर सो जा।”

मैंने मना किया,
“नहीं… मैं बाहर ही सो जाऊँगी।”

दीदी की आवाज में अचानक गुस्सा आ गया।
“यहीं सो जाओ। बाहर नहीं।”

उसके स्वर में जोर था। मैं कुछ बोल नहीं पाई। चुपचाप बेड के किनारे बैठ गई। दीदी ने जगह बनाई। एक तरफ दीदी, दूसरी तरफ जीजू, और मैं बीच में। दोनों पूरी तरह नंगे थे। दीदी की नंगी पीठ मुझसे सट रही थी। जीजू की बाजू दूसरी तरफ से छू रही थी। चादर आधी-अधूरी थी।

मेरी पैंटी पूरी तरह गीली थी। जाँघों के बीच नमी फैल रही थी। शरीर में गर्मी थी। लेकिन अब कुछ कर नहीं सकती थी। मैंने आँखें बंद कर लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। कमरे में तीनों शरीरों की गर्मी और सेक्स की हल्की गंध फैली हुई थी। दीदी और जीजू की साँसें धीरे-धीरे नियमित होने लगीं। वो सो गए।

मैं आँखें बंद किए पड़ी रही। गीली पैंटी के साथ, तड़पती चूत के साथ, दो नंगे शरीरों के बीच। नींद देर तक नहीं आई। लेकिन बाहर सोफे पर जाने की हिम्मत भी नहीं हुई। दीदी का गुस्सा वाला स्वर अभी भी कानों में गूँज रहा था।

रात धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
मैं कब सो गई, मुझे पता नहीं चला। थकान, उत्तेजना और अजीब सी बेचैनी के बीच नींद आ गई थी। आँखें खुलीं तो कमरे में हल्की अंधेरा था। खिड़की से समुद्र की तरफ से हल्की रोशनी आ रही थी। घड़ी में लगभग पाँच बज रहे थे।

दीदी और जीजू धीमी आवाज में बात कर रहे थे। मेरी अधूरी नींद टूट गई, लेकिन मैंने आँखें बंद रखीं। साँसें नियमित रखने की कोशिश की ताकि लगे कि मैं सो रही हूँ।

दीदी की आवाज आई,
“हाँ हाँ… तीनों भी करेंगे। अभी रुको तो सही। छह दिन और बचे हैं। छोटी की भी सील अभी तोड़ेंगे।”

मेरा दिल एकदम जोर से धधक उठा। शरीर में जैसे करंट चल गया। छोटी… यानी मैं। सील तोड़ना…। आँखें बंद होने के बावजूद दिमाग तेज घूमने लगा।

जीजू की भारी आवाज में जवाब मिला,
“मेरा तो जी कर रहा है कि अभी नंगी करके पेल दूँ।”

दीदी ने हल्के स्वर में रोका,
“नहीं। वो अपनी मर्जी से देगी। सामने से। अब अपना लंड अंदर डालो। मुझे नींद नहीं आ रही। लंड तो पूरी रात चूत में ही होना चाहिए।”

चादर के हल्के खिसकने की आवाज आई। फिर दीदी की हल्की आह। लग रहा था जीजू ने पीछे से या साइड से लंड अंदर डाल दिया है। दोनों की साँसें फिर से भारी होने लगीं। हल्की हरकतें होने लगीं। मैं आँखें बंद किए पड़ी रही। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे डर लग रहा था कहीं उनको सुनाई न दे जाए।

मेरा मन उस पल बहुत अजीब हालत में था। एक तरफ बहुत जोर से इच्छा हो रही थी कि अभी उठकर खुद को दे दूँ। शरीर तड़प रहा था। रात भर की भीगी हुई चूत अभी भी संवेदनशील थी। लेकिन दूसरी तरफ दिमाग कह रहा था – ऐसे नहीं। जबरदस्ती या नींद में नहीं। अब मुझे समझ आ गया था कि आगे क्या करना है। अपनी मर्जी से, सामने से… जैसा दीदी ने कहा।

थोड़ी देर बाद हरकतें रुक गईं। दोनों की साँसें फिर से गहरी होने लगीं। वो सो गए। मैं देर तक आँखें बंद किए पड़ी रही। “छोटी की सील” वाला वाक्य बार-बार कानों में गूँज रहा था। आखिरकार थकान ने फिर से मुझे घेर लिया।

अगली बार जब आँखें खुलीं तो कमरे में अच्छी रोशनी थी। लगभग नौ बज रहे होंगे। मैंने हल्के से करवट ली तो महसूस हुआ कि बगल में कोई हरकत कर रहा है। आँखें खोलीं।

दीदी मेरे बिल्कुल पास थी। वो जीजू के ऊपर बैठी हुई थी। नंगी। जीजू भी नंगे लेटे हुए थे। दीदी का चेहरा मेरी तरफ नहीं था, लेकिन उसका शरीर इतने करीब था कि मैं साफ देख सकती थी। वो लंड पर बैठकर ऊपर-नीचे हो रही थी। धीमी लेकिन गहरी हरकतें। स्तन हर बार ऊपर-नीचे काँप रहे थे। जीजू के हाथ उसकी कमर पर थे। दोनों की साँसें भारी थीं।

दीदी कभी धीरे बैठती, कभी जोर से। कभी आगे झुक जाती तो उसके बाल मेरे हाथ के पास आ जाते। कमरे में हल्की गीली आवाजें आ रही थीं। मैं हिल नहीं रही थी। साँस रोककर देखे जा रही थी। मेरी चूत फिर से तड़पने लगी। रात वाली गीली पैंटी अभी भी चिपकी हुई थी।

थोड़ी देर और चला। दीदी की रफ्तार बढ़ गई। वो अब जोर-जोर से बैठने लगी। आहें निकलने लगीं। जीजू नीचे से भी कमर उठा रहा था। अचानक दीदी की शरीर अकड़ गई। उसने जीजू की छाती पर हाथ रखे और जोर से नीचे बैठ गई। उसकी लंबी सिसकी निकली। उसी समय जीजू ने भी उसके कूल्हे दबाए और अंदर ही पानी निकाल दिया। दोनों कुछ पल वैसे ही जुड़े रहे। काँपते हुए।

दीदी ने धीरे से साँस छोड़ी और जीजू के ऊपर झुक गई। लंड अभी भी अंदर था। दोनों की पीठ पसीने से चमक रही थी। मैं आँखें बंद करके फिर से सोने का नाटक करने लगी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शरीर में गर्मी लहरें मार रही थी।

दीदी ने धीरे से लंड बाहर निकाला और जीजू के बगल में लेट गई। दोनों फिर से शांत हो गए। कमरे में अब सिर्फ पंखे और समुद्र की हल्की आवाज रह गई। मैं बिस्तर पर लेटी हुई अपनी तड़पती हुई चूत और रात-सुबह की सारी बातें दोनों के बीच फँसी हुई थी।

छह दिन और बचे थे।
और दीदी के मुँह से निकला वाक्य अभी भी कानों में घूम रहा था।

थोड़ी देर बाद दोनों का राउंड खत्म हो चुका था। दीदी जीजू के बगल में लेटी हुई साँसें सँभाल रही थी। कमरे में अभी भी सेक्स की हल्की गंध बनी हुई थी। दीदी ने करवट लेते हुए मुझसे कहा,

“आज तू फ्रेश हो जा। फिर तुम्हारे लिए भी सरप्राइज है।”

इतने में डोरबेल बज उठी। जीजू ने तुरंत चादर खींचते हुए कहा,
“डोर ओपन करो। ब्रेकफास्ट वाला आया है।”

दीदी और जीजू दोनों नंगे ही कंबल के अंदर घुस गए। मैंने जल्दी से बिस्तर से उतरकर दरवाजा खोला। स्टाफ ने ट्रे टेबल पर रखी और चला गया। मैंने दरवाजा बंद किया। पीछे मुड़कर देखा तो दीदी और जीजू अभी भी कंबल के अंदर थे। थोड़ी देर बाद दोनों निकले। दीदी ने लापरवाही से ब्रा-पैंटी पहन ली, जीजू ने शॉर्ट्स।

तीनों ने टेबल पर नाश्ता शुरू किया। चुपचाप। कुछ देर बाद दीदी ने अचानक मेरी तरफ देखते हुए कहा,

“चुदाई मजा आ रहा है ना तुझे? तुम भी कभी ऐसे ही एंजॉय करोगी रोहन के साथ।”

मेरी साँस एकदम तेज हो गई। दिल जोर से धधक उठा। रोहन… मेरा बॉयफ्रेंड। जिससे मैं शादी करना चाहती थी। दीदी को कैसे पता? मैंने कभी घर में किसी को नहीं बताया था। दिमाग में सवालों का तूफान आ गया।

दीदी ने मेरी हालत देखकर हल्के स्वर में कहा,
“तुम ज्यादा सोचो मत। मुझे सब पता है। तुम रोहन को मिलने वाली थी आज से पंद्रह दिन बाद होटल में। और तुम्हें शादी भी करनी है रोहन के साथ। जो तुझे शादी करनी है रोहन से, तो पापा से मैं बात करूँगी। तुम्हारी शादी भी करवाऊँगी। पर तुझे अपने जीजू को खुश करना पड़ेगा। और ये बात सिर्फ हम तीन को ही पता रहेगी।”

जीजू ने नाश्ते का टुकड़ा मुँह में रखते हुए कहा,
“बस यहाँ पर ही। बाकी घर जाके मैं कभी तुझे इस बारे में नहीं बोलूँगा।”

मैं चुपचाप बैठी उनकी बातें सुन रही थी। दिमाग में रोहन का चेहरा घूम रहा था। शादी… पापा से बात… और बदले में जीजू को खुश करना। मेरी इच्छा तो पहले से ही रोहन से शादी की थी। लेकिन ये शर्त…

थोड़ी देर खामोशी रही। फिर मैंने धीमी लेकिन साफ आवाज में कहा,

“ठीक है दीदी। लेकिन मेरी शादी कुछ भी हो, तुझे करवानी ही पड़ेगी। और कोई भी वीडियो घर या गाँव नहीं जाएगी। और आराम-आराम से होगी चुदाई।”

दीदी ने मेरी आँखों में देखा। फिर धीरे से सिर हिलाया।
“हो जाएगा। सब हो जाएगा।”

जीजू ने भी सिर हिलाया। नाश्ते की टेबल पर तीनों के बीच एक अजीब सा समझौता हो चुका था। समुद्र की लहरें बाहर हल्के स्वर में आवाज कर रही थीं। विला के काँच के दीवारों से सुबह की रोशनी आ रही थी।

मैंने कप में बची चाय की आखिरी घूँट ली। हाथ हल्के काँप रहे थे। मन में डर, उत्सुकता और एक अजीब सी स्वीकारोक्ति एक साथ चल रही थी। छह दिन अभी बाकी थे। और अब बात सिर्फ देखने की नहीं रह गई थी।

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