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दीदी की एनिवर्सरी ओर मेरी… 4

नाश्ता खत्म होने के बाद टेबल पर थोड़ी खामोशी छाई रही। दीदी ने मेरी तरफ देखा और साफ स्वर में बोली,

“रात डिनर के बाद तैयार रहना चुदाई के लिए। तब तक तुम्हारे जीजू तुम्हें छुएंगे भी नहीं। तब तक मैं मजे ले लेती हूँ।”

उसकी बात में न कोई हँसी थी, न कोई नरमपन। सीधा फैसला सुनाया था। जीजू ने सिर्फ सिर हिलाया। मैंने कुछ नहीं कहा। बस नज़रें झुका लीं। दिल की धड़कन फिर से तेज हो गई थी।

थोड़ी देर बाद दीदी उठी और बोली, “चलो, पूल में चलते हैं।”

तीनों पूल की तरफ गए। सुबह की धूप अब तेज हो चुकी थी। पानी चमक रहा था। दीदी ने बिना किसी हिचक के अपना ब्रा-पैंटी उतार दिया। जीजू ने भी शॉर्ट्स नीचे कर दी। दोनों पूरी तरह नंगे पूल में उतर गए। मैं किनारे पर खड़ी रही। दीदी ने मेरी तरफ देखकर कहा,

“तू भी उतर जा। लेकिन आज सिर्फ देखना है। छूना नहीं।”

मैंने बिकिनी में ही पानी में कदम रखा। दोनों पहले से पानी में थे। जीजू ने दीदी को दीवार की तरफ धकेल दिया। दोनों का शरीर पानी में चिपक गया। लंबा किस शुरू हो गया। जीजू के हाथ दीदी के स्तनों पर थे, दीदी के हाथ उसकी कमर पर। पानी में उनकी हरकतें साफ दिख रही थीं। थोड़ी देर बाद जीजू ने दीदी को घुमाया। दीदी ने पूल की किनारे वाली दीवार पकड़ ली। जीजू ने पीछे से अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। पानी में हल्की लहरें उठने लगीं। दीदी की आहें पानी की आवाज में मिल रही थीं।

“आह… हाँ… जोर से…”

जीजू ने उसकी कमर पकड़कर धक्के मारने शुरू कर दिए। पानी छलक रहा था। दीदी का चेहरा साइड में मुड़ा हुआ था। आँखें आधी बंद थीं। मैं थोड़ी दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थी। मेरी अपनी साँसें तेज हो चुकी थीं। पानी के अंदर मेरे शरीर में गर्मी फैल रही थी। दोनों लगभग बीस-पच्चीस मिनट तक पूल में ही जुड़े रहे। आखिर में जीजू ने दीदी की कमर कसकर अंदर ही पानी छोड़ दिया। दीदी ने लंबी सिसकी भरी और दीवार से लगकर खड़ी रही।

दोनों ने पानी से निकलकर तौलिए से शरीर पोंछे। नंगे ही विला के अंदर आए। कपड़े पहने। फिर तीनों बाहर निकले। मालदीव की सड़कों पर घूमे। समुद्र किनारे चले। कई जगह रुक-रुककर फोटो खिंचवाईं। दीदी और जीजू सामान्य कपल की तरह व्यवहार कर रहे थे। कभी हाथ पकड़े, कभी हल्के में हँसे। मैं उनके साथ-साथ चलती रही। मन में सुबह वाली बात और पूल वाला नजारा बार-बार घूम रहा था। दोपहर के खाने के बाद और घूमे। समुद्र के पास बैठकर देर तक बातें कीं। समय बीतता गया।

शाम के लगभग पाँच बजे हम विला वापस पहुँचे। थकान हो रही थी। तीनों ने थोड़ा आराम किया। दीदी और जीजू बेडरूम में चले गए। मैं लिविंग वाले हिस्से में सोफे पर लेट गई। आँखें बंद कीं लेकिन नींद नहीं आई। शरीर में एक अजीब सी बेचैनी थी।

सात बजे के करीब डिनर आ गया। तीनों ने साथ में खाना खाया। बातें कम हुईं। माहौल में एक अलग तनाव था। खाना खत्म होने के बाद टेबल साफ किया गया। जीजू ने कुर्सी से उठते हुए मेरी तरफ देखा और सीधी आवाज में बोला,

“चोटी… रेडी हो जा।”

दीदी ने भी मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में वही निर्णायक भाव था जो सुबह था। कमरे में सजावट की रोशनी अभी भी जल रही थी। समुद्र की लहरों की आवाज दूर से आ रही थी। मैं कुर्सी पर बैठी रही। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। रात अब सही मायनों में शुरू होने वाली थी।

डिनर खत्म होने के बाद कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी। दीदी ने मेरी तरफ देखा और धीमी लेकिन साफ आवाज में बोली,

“थोड़ा डर लगेगा आज। लेकिन बाद में मजे आएंगे।”

मैं कुछ बोल नहीं पाई। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। जीजू मेरे पास आया। उसने बिना कुछ कहे मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और किस करना शुरू कर दिया। पहले हल्का, फिर जोर से। उसकी जीभ मेरे होठों को खोलने लगी। मैंने पहले हिचकिचाहट महसूस की, लेकिन कुछ ही पल बाद मैं भी जवाब देने लगी। मेरी साँसें तेज हो गईं। दीदी पास खड़ी यह सब देख रही थी।

जीजू के हाथ मेरी कमर पर आ गए। फिर ऊपर। उसने मेरे छोटे ड्रेस के जिप को खोला और उसे कंधों से नीचे सरका दिया। ड्रेस फर्श पर गिर गया। अब मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। जीजू ने ब्रा के हुक खोले। ब्रा उतरते ही मेरे स्तन बाहर आ गए। उसने दोनों हाथों से उन्हें दबाया और निप्पल्स को उँगलियों के बीच लेकर मसलने लगा। मुझे अजीब सी सनसनाहट हुई। फिर उसने सिर झुकाया और एक निप्पल मुँह में ले लिया। जोर से चूसने लगा। मैंने उसकी गर्दन में हाथ डाल दिए। आँखें बंद हो गईं।

थोड़ी देर बाद उसने मुझे बेड पर लिटा दिया। पैंटी भी खींच ली। अब मैं पूरी तरह नंगी थी। जीजू ने अपनी शॉर्ट्स उतारी। उसका १२ इंच का मोटा लंड पूरी तरह खड़ा था। उसने कंडोम का पैकेट खोला और लंड पर चढ़ा दिया। दीदी ने पास आकर मेरी टाँगें फैलाईं। मैंने शर्म और डर से उन्हें मिलाने की कोशिश की, लेकिन दीदी ने रोक दिया।

“डर मत। सह ले,” दीदी ने कहा।

जीजू मेरे ऊपर आ गया। लंड का मोटा सिर मेरी चूत पर टिका। उसने हल्का दबाव दिया। सिर्फ सिर अंदर गया और मुझे तेज दर्द महसूस हुआ। मैंने जोर से चीख मारी।

“आआह्ह्ह… दर्द… निकालो…”

जीजू ने और धक्का दिया। आधा लंड अंदर चला गया। मेरी आँखों से आँसू निकल आए। मैंने उसके सीने को धक्का देना शुरू कर दिया।

“नहीं… बहुत दर्द… निकालो… प्लीज…”

दीदी ने मेरे हाथ पकड़ लिए।
“सह ले चोटी… अभी टूटेगी।”

जीजू ने एक जोरदार धक्का मारा। पूरा लंड एक साथ अंदर धँस गया। मुझे ऐसा लगा जैसे कुछ अंदर फट गया हो। तेज जलन और दर्द की लहर पूरे शरीर में दौड़ गई। मैं जोर-जोर से चीखने लगी। आँसू बह रहे थे। मैंने कमर पीछे हटाने की कोशिश की, लंड को बाहर धकेलने की कोशिश की, लेकिन जीजू ने मेरी कमर पकड़ रखी थी।

“आआआह्ह्ह… फट गई… दर्द… बहुत दर्द… निकालो… माँ…”

मेरी चीखें कमरे में गूँज रही थीं। दीदी मेरे बाल सहला रही थी और बार-बार कह रही थी, “अब हुआ… अब आदत पड़ेगी… सह ले…”

जीजू रुका नहीं। उसने धक्के शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ मुझे तेज दर्द हो रहा था। चूत जल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई लोहे का गरमा-गरम रॉड अंदर-बाहर हो रहा हो। मैं रो रही थी, चीख रही थी, जीजू की पीठ में नाखून गड़ा रही थी। लेकिन वो बिना रुके जोर-जोर से चोदता जा रहा था। पूरा लंड हर बार जड़ तक जा रहा था।

“नहीं… धीरे… दर्द… आआह्ह्ह… छोड़ो…”

दीदी मेरे हाथ थामे हुए थी। कभी मेरे स्तन सहलाती, कभी माथे पर हाथ फेरती। उसकी आवाज में न सहानुभूति थी न कठोरता – बस एक अनुभव की सच्चाई।

“चिल्ला… रो ले… लेकिन सह ले। पहली बार सबके साथ ऐसा ही होता है।”

समय बीत रहा था। दस मिनट, बीस मिनट, तीस मिनट… दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था। बस थोड़ा सुन्न पड़ने लगा था। जीजू की रफ्तार तेज हो गई थी। बेड जोर-जोर से हिल रहा था। मेरी चीखें अब सिसकियों में बदलने लगी थीं। आँखें सूज गई थीं। गला बैठ गया था। शरीर पसीने से तरबतर था।

करीब चालीस-पैंतालीस मिनट बाद जीजू की साँसें बहुत तेज हो गईं। उसने और गहरे धक्के मारे। लेकिन अचानक उसने लंड बाहर खींच लिया। कंडोम में हल्का खून और मेरा पानी लगा हुआ था। उसने झटके से कंडोम उतारा और फेंक दिया। फिर तुरंत दीदी की तरफ मुड़ा। दीदी पहले से ही लेटी हुई थी। जीजू ने उसके पैर फैलाए और बिना किसी देरी के लंड उसकी चूत में डाल दिया। कुछ जोरदार धक्के मारे और फिर अंदर ही पानी छोड़ दिया। दीदी की हल्की आह निकली। जीजू उसके ऊपर झुका रहा। दोनों की साँसें हाँफ रही थीं।

मैं बेड के एक कोने में करवट लिए हुए जोर-जोर से रो रही थी। दोनों हाथों से अपनी चूत को पकड़े हुए थी। जलन हो रही थी। हल्का खून लग रहा था। शरीर काँप रहा था। आँसू नहीं रुक रहे थे। पहली बार… मेरी सील टूट चुकी थी। दर्द अभी भी लहरें मार रहा था।

दीदी ने जीजू के ऊपर से हटकर मेरे पास आने की कोशिश की, लेकिन मैंने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। कमरे में अब सिर्फ मेरी सिसकियाँ और उनकी भारी साँसें गूँज रही थीं। समुद्र की लहरें बाहर दूर से आवाज कर रही थीं। विला के काँच के दीवारों से रात की अंधेरी चमक आ रही थी।

मैं रोती रही। शरीर में दर्द था, मन में उथल-पुथल थी। रात अभी खत्म नहीं हुई थी… लेकिन मेरी पहली बार खत्म हो चुकी थी।

मैं बेड के किनारे करवट लिए हुए जोर-जोर से रो रही थी। दोनों हाथों से अपनी चूत को पकड़े हुए थी। जलन और दर्द की लहरें अभी भी पूरे निचले हिस्से में दौड़ रही थीं। हल्का खून उँगलियों पर लग रहा था। शरीर काँप रहा था। आँखें सूज चुकी थीं।

दीदी मेरे पास आई। उसने मेरे बालों को पीछे किया और धीमी आवाज में बोली,

“चोटी… आज के लिए इतना ही। कल…”

उसने और कुछ नहीं कहा। बस इतना। फिर वो बाथरूम गई और गीला तौलिया लेकर आई। उसने बहुत धीरे-धीरे मेरी चूत साफ की। तौलिया पर हल्का खून और पानी लग गया। मैंने दर्द से सिसकी भरी लेकिन उसने काम जारी रखा। साफ करने के बाद उसने मुझे पानी का गिलास पकड़ाया।

“पी ले। प्यास लगी होगी।”

मैंने काँपते हाथों से गिलास लिया और कुछ घूँट पीए। पानी गले से उतरते हुए भी दर्द याद दिला रहा था। दीदी ने मुझे बेड पर ठीक से लिटाया। तकिया ठीक किया। चादर का एक कोना मेरे शरीर पर डाल दिया। मैं नंगी ही लेटी रही। ताकत नहीं बची थी कपड़े पहनने की।

थोड़ी देर बाद जीजू ने एक छोटा सा बॉक्स निकाला। उसमें एक पतला सा नेकलेस था। सोने का, हल्का। उसने मेरे गले में पहना दिया। ठंडी धातु ने गर्दन को छुआ। मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ आँखें बंद कर लीं। आँसू अभी भी रुक-रुककर बह रहे थे।

फिर कमरे में फिर से हलचल शुरू हुई। जीजू ने दीदी को अपनी तरफ खींचा। दोनों का किस गहरा था। कपड़े पहले से ही कम थे। जल्दी ही दोनों फिर से नंगे हो गए। जीजू ने दीदी को डॉगी स्टाइल में कर दिया। लुब्रिकेंट लगाया। फिर अपना लंड उसकी गांड में डालने लगा। दीदी की आवाज में दर्द साफ था।

“आह्ह… धीरे… अभी भी सूजी है…”

जीजू ने पूरी तरह अंदर कर दिया और धक्के शुरू कर दिए। दीदी के हाथ तकिया कस रहे थे। वो सिसकियाँ ले रही थी। कभी-कभी जोर से आहें निकल जातीं। जीजू करीब बीस-पच्चीस मिनट तक उसकी गांड में जोर-जोर से पेलता रहा। आखिर में उसने अंदर ही पानी छोड़ दिया। दीदी आगे की तरफ गिर गई। साँसें हाँफ रही थीं। दोनों थककर बेड पर फैले पड़े थे।

मैं उनकी तरफ पीठ किए हुए लेटी रही। दर्द अभी भी था। थकान ने आखिरकार मुझे जकड़ लिया। कब नींद आई, पता नहीं चला। नंगी ही सो गई।

रात के लगभग चार बज रहे होंगे। नींद अचानक टूटी। एक तेज, भयंकर दर्द के साथ। किसी ने एक ही झटके में कुछ मेरी चूत में धकेल दिया था। पूरा। एकदम अंदर तक। मैंने जोर से चीख मारी —

“आआआह्ह्ह!!!!!!!!!”

जीजू ने तुरंत मेरा मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया। उसकी हथेली मेरे होठों पर दब गई। मैं आँखें फाड़े हुए थी। दर्द इतना तेज था कि साँस अटक रही थी। जीजू मेरे ऊपर था। उसका लंड बिना कंडोम के मेरी चूत में पूरी तरह धँसा हुआ था। उसने धक्के शुरू कर दिए। जोर के, गहरे, बिना किसी रियायत के।

मैं रो रही थी। आँखों से आँसू बह रहे थे। मुँह उसके हाथ के नीचे सिसकियाँ निकाल रहा था। दर्द पहले से कहीं ज्यादा लग रहा था। कल वाली जलन में अब नए धक्कों की तेज चुभन जुड़ गई थी। हर बार जब लंड अंदर जाता तो लगता जैसे फिर से कुछ फट रहा हो। मैंने उसके हाथ को हटाने की कोशिश की, कमर पीछे करने की कोशिश की, लेकिन वो मजबूत था। मेरी टाँगें उसके कूल्हों के दोनों तरफ फैली हुई थीं। वो लगातार पेल रहा था।

“उम्म… उम्म…” मेरे गले से सिर्फ दबी आवाजें निकल रही थीं। आँसू उसके हाथ तक बह रहे थे। शरीर काँप रहा था। दीदी बगल में लेटी हुई थी। उसने आँखें खोल ली थीं लेकिन कुछ नहीं बोला। बस देख रही थी।

जीजू करीब पंद्रह-बीस मिनट तक इसी तरह जोर-जोर से चोदता रहा। मेरी चूत जल रही थी। दर्द इतना था कि मुझे लग रहा था कि मैं बेहोश हो जाऊँगी। आखिर में जब मेरी सिसकियाँ बहुत तेज हो गईं और शरीर ज्यादा तड़पने लगा तो उसने लंड बाहर खींच लिया। अचानक खाली होने पर भी दर्द की एक तेज लहर दौड़ गई। मैंने मुँह खोलकर लंबी साँस ली और जोर से रोने लगी। दोनों हाथों से अपनी चूत पकड़ ली।

“बहुत दर्द… बहुत… मत करो…”

जीजू ने कुछ नहीं कहा। उसका लंड अभी भी पूरी तरह खड़ा था। दीदी उठकर बैठ गई। उसने बिना किसी बात के जीजू के लंड को हाथ में लिया और उसके ऊपर सवार हो गई। खुद ही लंड को अपनी चूत में सेट करके नीचे बैठ गई। फिर ऊपर-नीचे होने लगी। जोर-जोर से। उसके स्तन काँप रहे थे। आहें निकल रही थीं। जीजू उसके कूल्हे पकड़े हुए नीचे से धक्के मार रहा था।

मैं बगल में करवट लिए हुए रो रही थी। शरीर में दर्द लहरें मार रहा था। चूत सूजी हुई और संवेदनशील थी। आँसू तकिए को भिगो रहे थे। दीदी जीजू के ऊपर बैठकर मजे ले रही थी। कमरे में फिर से गीली आवाजें और आहें गूँजने लगी थीं। मैं नंगी, दर्द में, रोती हुई उनके बगल में लेटी रही। नींद अब पूरी तरह टूट चुकी थी। रात अभी बाकी थी।
उस रात के बाद दो दिन और बीते। जीजू ने उन दोनों दिनों में मुझे बेरहमी से चोदा। सुबह, दोपहर, रात — बिना किसी रियायत के। दर्द बहुत हुआ। कभी रोती, कभी सह लेती। दीदी ज्यादातर पास रहती। कभी मुझे सहलाती, कभी खुद जीजू के साथ जुड़ जाती। तीसरे दिन से दर्द कम होना शुरू हुआ। जलन जाती रही और उसकी जगह एक अजीब सी गर्मी ने ले ली। फिर धीरे-धीरे मजा आने लगा। शरीर खुद प्रतिक्रिया देने लगा।

उसके बाद तो पूरे विला में कोई कोना नहीं बचा जहाँ हम तीनों ने सेक्स न किया हो। पूल में पानी के अंदर, बालकनी में समुद्र के सामने, लिविंग रूम के सोफे पर, काँच की दीवारों के सामने, बेड पर, फर्श पर… हर जगह। कभी सिर्फ मैं और जीजू, कभी दीदी भी साथ। कभी दीदी देखती रहती, कभी मैं। सात दिनों में बहुत कुछ हो गया। बहुत मजे लिए। शरीर थक गया था, लेकिन मन में एक अजीब सा सुकून और उलझन दोनों थे।

सातवें दिन हम घर वापस लौटे। एयरपोर्ट पर पापा मिले। सामान्य मुस्कानें, सामान्य बातें। घर आकर सब कुछ पहले जैसा लगने लगा, लेकिन अंदर बहुत कुछ बदल चुका था।

रोहन से जो मुलाकात पंद्रह दिन बाद होनी थी, वो कैंसल हो गई। मैंने खुद टाल दी। मन नहीं मान रहा था। बीस दिन बाद दीदी और जीजू ने घर में बात आगे बढ़ाई। पापा से चर्चा हुई। रिश्ते वाले आए। मेरी सगाई रोहन से फिक्स हो गई। घर में खुशी का माहौल था। मम्मी मिठाई बाँटने लगीं। मैं मुस्कुराती रही।

कुछ दिन बाद दीदी ने खुशखबरी दी।
“मैं माँ बनने वाली हूँ।”

पेट में नया जीवन था। जीजू के चेहरे पर एक अलग संतोष था। घर में फिर से मिठाईयाँ बँटीं। मैंने दीदी को गले लगाया। उसकी आँखों में मुस्कान थी।

रोहन से मुलाकात हुई। हम दोनों अकेले बैठे। बातें हुईं। उसने मेरा हाथ पकड़ा। एक लंबा किस हुआ। बाकी सब… शादी के बाद। मैंने साफ कह दिया। उसने स्वीकार कर लिया।

चार महीने बाद हमारी शादी हो गई। रस्मों-रिवाज, मेहंदी, संगीत, विदाई… सब हुआ। रोहन के साथ नया घर। नया जीवन।

दीदी और जीजू अपने घर में खुश थे। उनका बच्चा आने वाला था। मैं रोहन के साथ अपनी जिंदगी शुरू कर चुकी थी।

मेरी सुहागरात की कहानी…
कभी बाद में बताऊँगी।

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