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तीन बहुओं का घोड़ा 3

अध्याय 3: घर वापसी और माँ की कुर्बानी

थाईलैंड से वापस आने के बाद सिर्फ 4 दिन बीते थे। पटाया की वो रातें अभी भी मेरी चुत में दर्द के रूप में महसूस हो रही थीं। विक्रम हर रात लावा की तरह मुझे चोदना चाहता था, लेकिन मैं अब और सह नहीं पा रही थी। उसका 13 इंच का घोड़े जैसा लंड मेरी चुत के लिए अब सजा बन गया था।

रात को विक्रम फिर से तैयार था। 
“प्रिया… आज फिर से जोर से लेंगे…” 
“नहीं विक्रम… प्लीज… अभी भी सूजन है… मैं चल भी नहीं पा रही… कल से ट्राई करेंगे…” मैं रोते हुए बोली। 

लेकिन विक्रम ने मेरी टांगें खोल दीं और कंडोम लगाकर एक जोरदार धक्का मार दिया। 
“आआआह्ह्ह… नहीं… फट गई… विक्रम रुक जाओ… बहुत दर्द हो रहा है… मैं मर जाऊंगी… प्लीज निकालो…” मैं चीख पड़ी। 

वो रुका नहीं। 25 मिनट तक मुझे चोदा। मैं सिर्फ रोती रही। आखिर में जब वो झड़ा तो मैं बिस्तर पर बेहोश जैसी पड़ी थी। 

अगली सुबह मैंने फैसला कर लिया। 
“मुझे माँ के घर जाना है… 2-3 दिन के लिए…” 
विक्रम ने हामी भरी। मैं सीधा मम्मी के घर चली गई। 

मेरी माँ का नाम शीला है। उम्र 48 साल, लेकिन देखने में 38-40 जैसी लगती हैं। गोरी, भरे-भरे 38D स्तन, पतली कमर, मोटी गांड। विधवा हो चुकी हैं। घर में अकेली रहती हैं। 

जैसे ही मैं घर पहुंची, माँ ने मुझे गले लगाया। मैं रो पड़ी। 
“क्या हुआ बेटी? हनीमून से लौटकर इतनी उदास क्यों?” 

मैंने सारी बात बता दी – विक्रम का बहुत बड़ा और मोटा लंड, घोड़े जैसी चुदाई, थाईलैंड में लावा को बुलाना, और मेरी हालत। 

माँ ने मुझे सिर सहलाते हुए कहा, “बेटी… पुरुषों की भूख ऐसी ही होती है। तू चिंता मत कर। मैं बात कर लूंगी विक्रम से।” 

उसी शाम विक्रम मम्मी के घर आया मुझे लेने। मम्मी ने उसे चाय दी और सीधे मुद्दे पर आ गईं। 
“विक्रम बेटा… प्रिया बहुत परेशान है। तुम्हारा सामान बहुत बड़ा है, वो सह नहीं पा रही।” 

विक्रम शर्माया। माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, 
“मैं समझती हूँ… पुरुष को संतोष चाहिए। अगर तू चाहे तो… मैं मदद कर सकती हूँ… बस प्रिया को आराम मिल जाए।” 

मैं हैरान रह गई। “माँ… तुम क्या कह रही हो?” 

माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरा, “बेटी… माँ-बेटी का रिश्ता। तेरा सुख मेरे लिए सबसे बड़ा है।” 

विक्रम की आँखें चमक उठीं। 

उसी रात… 

मैं अपने कमरे में थी। माँ और विक्रम वाले कमरे में गए। दरवाजा बंद था, लेकिन मैं चुपके से बाहर खड़ी सुन रही थी। 

पहले तो बातें हुईं। फिर आवाजें… 

“आह्ह… विक्रम… धीरे… तुम्हारा तो बहुत बड़ा है… आआह्ह… पूरा मत घुसाओ… मेरी चुत 48 साल बाद खुल रही है…” माँ की आवाज आई। 

विक्रम ने जोरदार धक्का मारा। 
“पच… पच… पच…” 

माँ चीखीं, “नहीं… बेटा… रुक जाओ… फट रही है… इतना मोटा… आह्ह… पेट तक जा रहा है… प्लीज धीरे… मैं तेरी सास हूँ… आआह्ह… नहीं… और जोर से मत…” 

लेकिन विक्रम ने घोड़े जैसी रफ्तार पकड़ ली। मैं बाहर खड़ी सुन रही थी। माँ की चीखें लगातार बढ़ रही थीं। 

“विक्रम… नहीं… मैं सह नहीं पा रही… आह्ह… मेरी चुत फाड़ दी… प्लीज रुक… मैं तेरी सास हूँ… ये गलत है… आआह्ह… हाँ… और गहरा… नहीं… मत… मैं झड़ रही हूँ… आआआह्ह्ह…” 

मैंने दरवाजे की दरार से झांका। माँ कुत्ते की मुद्रा में थीं। विक्रम पीछे से जोर-जोर से ठोक रहा था। माँ के स्तन लटक-लटककर हिल रहे थे। उनका चेहरा पसीने से तर, आँखें बंद, मुंह से लार टपक रही थी। 

विक्रम ने माँ के बाल पकड़े और और तेज किया। 
“सास जी… आपकी चुत तो बहुत टाइट है… प्रिया से ज्यादा सह ले रही हो…” 

माँ रोते हुए चीखीं, “नहीं… मैं प्रिया की माँ हूँ… प्लीज… मेरी हालत खराब मत करो… आह्ह… मैं मर जाऊंगी… रुक जाओ… बहुत हो गया… आआह्ह… फिर से झड़ गई…” 

एक घंटे बाद माँ की हालत पूरी तरह खराब हो चुकी थी। वो बिस्तर पर लेटी हुई थीं, टांगें फैली हुईं, चुत लाल और सूजी हुई, विक्रम का वीर्य (कंडोम में) बाहर रिस रहा था। उनका शरीर कांप रहा था। 

विक्रम अभी भी खड़ा था। उसने माँ को घसीटकर फिर से अपनी गोद में लिया। 
“सास जी… एक राउंड और…” 

माँ ने कमजोर आवाज में कहा, “नहीं बेटा… प्लीज… अब मत… मैं चल भी नहीं पा रही… मेरी चुत जल रही है… प्रिया को बुला लो…” 

लेकिन विक्रम ने फिर से घुसा दिया। 
“आआह्ह… नहीं… फिर से… विक्रम… तू तो जानलेवा है… प्लीज रुक… मैं तेरी सास हूँ… आह्ह… हाँ… मत निकाल… पूरा अंदर…” 

मैं बाहर खड़ी रो रही थी, लेकिन मेरी चुत भी गीली हो गई थी।

रात भर माँ की चीखें, “नहीं… प्लीज… रुक जाओ… मैं मर जाऊंगी… आह्ह… और जोर से…” सुनाई देती रहीं। सुबह तक माँ की हालत बुरी तरह खराब हो गई थी – वो उठ भी नहीं पा रही थीं, चुत सूजकर लाल हो गई थी, शरीर में दर्द, लेकिन चेहरा संतोष से भरा था।

विक्रम ने मुझे बुलाकर कहा, “अब तू आराम कर। तेरी माँ ने मुझे संभाल लिया।”

माँ ने कमजोर आवाज में मुझे देखा और कहा, “बेटी… अब तू चिंता मत कर… माँ है ना…”

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One response to “तीन बहुओं का घोड़ा 3”

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