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दीदी की एनिवर्सरी ओर मेरी… 1

मेरी उम्र 20 साल हे है और मेरे घर में अब मेरी शादी की बातें भी धीरे-धीरे शुरू हो गई थीं। रिश्ते आने लगे थे, मम्मी-पापा चर्चा करने लगे थे। इसी बीच दीदी का फोन आया। उसने बताया कि वो और जीजू अपनी तीसरी एनिवर्सरी मनाने मालदीव जा रहे हैं। फिर अचानक बोली,

“तुम्हें भी साथ चलना है।”

मैंने हैरानी से पूछा, “मैं?”
दीदी ने हँसते हुए कहा, “हाँ। मम्मी से बात हो गई है। वो राजी हो गई हैं। तुम अकेली मत रहो, साथ चलो। घूम भी लोगी और हम भी रहेंगे।”

मम्मी ने जब पुष्टि की तो बात पक्की हो गई। टिकट कट गईं। सिर्फ दो दिन बाकी रह गए थे जाने में। तभी दीदी का फिर से कॉल आया। आवाज में हल्की उत्सुकता थी।

“तुम अब बड़ी हो गई हो,” उसने सीधे कहा। “इसलिए अच्छे-अच्छे कपड़े लेना। छोटे-छोटे वाले। वहाँ फोटो अच्छी आएंगी। समुद्र किनारे, पूल के पास… सब जगह। और एक काम जरूर कर लेना — वैक्स करवा लेना। नहीं तो छोटे कपड़ों में दिखेगा। साफ-सुथरी रहना।”

मैंने फोन काटने के बाद काफी देर तक उसकी बात सोची। फिर उसी दिन पार्लर चली गई। फुल बॉडी वैक्सिंग करवाई। बिकिनी लाइन भी साफ करवाई। बालों की स्टाइलिंग करवाई। घर आकर कपड़ों की लिस्ट बनाई — छोटे टॉप, शॉर्ट्स, वन-पीस, हल्के रंगों वाले कपड़े। मम्मी ने भी कुछ नए कपड़े दिलवाए। सब कुछ तैयार हो गया।

दो दिन बाद हम हवाई अड्डे के लिए निकलने वाले थे। दीदी और जीजू पहले से मालदीव में होने वाले थे, हम बाद में उनसे जा मिलने वाले थे। घर में हल्की सी उत्सुकता थी। मेरी शादी की चर्चाओं के बीच यह ट्रिप एक अलग रंग लेकर आई थी।

मैंने दर्पण के सामने खड़े होकर खुद को देखा। शरीर साफ था, कपड़े नए थे। दीदी की बातें कानों में घूम रही थीं — “अब तुम बड़ी हो गई हो… अच्छे कपड़े… वैक्स…”। तीन साल पहले जो दीदी शर्माती थी, आज वही दीदी मुझे ये सब सलाह दे रही थी। समय सच में बहुत कुछ बदल चुका था।
सामान बंद करके मैंने कमरे की लाइट बुझा दी। कल सुबह उड़ान थी। मालदीव इंतजार कर रहा था।
तय दिन आ गया। सुबह जल्दी तैयार होकर मैं हवाई अड्डे के लिए निकली। पापा मुझे एयरपोर्ट तक छोड़ने आए। रास्ते में उन्होंने सामान्य बातें कीं — संभाल के रहना, दीदी के साथ रहना, ज्यादा अकेली मत घूमना। एयरपोर्ट पहुँचकर पापा ने सामान में मदद की और विदा की। अंदर जाते ही मैंने दीदी और जीजू को देखा। दोनों पहले से वहाँ मौजूद थे। दीदी ने मुझे देखते ही गले लगा लिया। जीजू ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, अब तीनों का ग्रुप हो गया।”

चेक-इन, सिक्योरिटी और बोर्डिंग सब सामान्य रहा। विमान में हम तीनों साथ बैठे। दीदी खिड़की वाली सीट पर थी, मैं बीच में, जीजू किनारे। उड़ान भरने के बाद दीदी ने हल्के स्वर में कहा, “अब मजा आएगा। सात दिन पूरी आजादी।” जीजू ने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिलाया। मैं खिड़की से बाहर देखती रही। दिल में हल्की उत्सुकता और अजीब सा बेचैनी दोनों थे।

कई घंटों की उड़ान के बाद हम मालदीव पहुँचे। वहाँ से स्पीडबोट से हमारे विला तक जाना था। सुबह के लगभग सात बज रहे थे जब हम विला के जेट्टी पर उतरे। सामान लेकर अंदर गए।

विला देखकर मैं हैरान रह गई। ये सामान्य होटल रूम नहीं था। पूरा का पूरा एक प्राइवेट लग्जरी विला था। एक बीएचके जैसा लेआउट था, लेकिन आकार में बहुत बड़ा। सिर्फ एक ही मुख्य गेट था। सबसे चौंकाने वाली बात ये थी कि विला का बड़ा हिस्सा काँच का बना था। दीवारें, कुछ कोने, यहाँ तक कि बाथरूम के कुछ हिस्से भी पारदर्शी थे। बाहर से अंदर और अंदर से बाहर लगभग सब कुछ दिख रहा था। समुद्र का पानी बिलकुल पास था। पूल, डेक, और खुला बैठने का क्षेत्र — सब कुछ लग्जरी और महंगा लग रहा था।

दीदी ने सामान रखते हुए कहा, “सात दिन के लिए ये पूरा विला हमारा है। कोई गड़बड़ नहीं। पूरा प्राइवेट।” जीजू ने कमरों का जायजा लिया। एक मास्टर बेडरूम था, जिसमें बड़ी सी ग्लास वॉल थी। विला में सब कुछ महंगा और चमकदार था — सफेद फर्श, बड़े-बड़े शीशे, आरामदायक सोफे, और बाहर सिर्फ समुद्र और आसमान।

सुबह के सात बजे हम पूरी तरह पहुँच चुके थे। थकान थी, लेकिन माहौल इतना हरा-भरा और शांत था कि नींद गौण लग रही थी। दीदी ने खिड़की के पास खड़े होकर समुद्र देखा और मुस्कुराई। जीजू ने कॉफी बनाने की बात कही। मैं चुपचाप खड़ी विला के काँच के दीवारों को देख रही थी। सब कुछ इतना खुला और पारदर्शी था कि मन में कई ख्याल आ रहे थे।

सात दिन यहीं बीतने वाले थे।
पूरे विला में असल में एक ही बेडरूम था। बाकी पूरा हिस्सा लिविंग रूम जैसा था, जहाँ बड़े-बड़े सोफे रखे थे। बेडरूम के सामने का हिस्सा पूरी तरह खुला हुआ था। मैंने अपना सामान लिविंग वाले हिस्से में ही रख दिया।

थोड़ी देर बाद नाश्ता हुआ। तीनों ने साथ में खाया और फिर फ्रेश हुए। सबसे खास बात ये थी कि सिर्फ बाथरूम के अंदर ही पर्दे लगे थे। बाकी पूरा विला काँच का बना था। दीवारें, कोने, लगभग हर जगह से अंदर-बाहर सब कुछ साफ दिख रहा था। जो भी करो, बाहर से या दूसरी तरफ से नजर आ सकता था। पूरा प्राइवेसी सिर्फ बाथरूम में ही थी।

सात दिन का ये पारदर्शी लग्जरी विला अब हमारा था।
नाश्ता खत्म होने के बाद दीदी और जीजू बेडरूम में चले गए। उनका बड़ा सा बैग बिस्तर पर खुला पड़ा था। दोनों कपड़े निकाल-निकालकर देख रहे थे। दीदी ने मुझे आवाज दी,
“चोटी, इधर आ ना। कपड़े दिखाऊँ।”
मैं कमरे में गई। बैग में से कपड़े निकले जा रहे थे — छोटी ड्रेसेस, स्विमसूट, हल्के टॉप। इतने में मेरी नजर बैग के एक कोने पर गई। अंदर कई पैकेट कंडोम रखे थे, अलग-अलग तरह के। साथ में लुब्रिकेंट की दो-तीन ट्यूबें भी थीं। दीदी ने देखा कि मैं देख रही हूँ, लेकिन उसने कोई परवाह नहीं की। उल्टे वो कपड़े और पैंटी निकाल-निकालकर मुझे दिखा रही थी।
“ये वाला अच्छा लगेगा ना? और ये शॉर्ट वाला…” वो सामान्य स्वर में बता रही थी।
फिर दीदी ने अचानक कहा,
“तुझे पता है ना, आज हमारी एनिवर्सरी है। उसी मौके पर तेरे जीजू मुझे मालदीव लेकर आए हैं।”
जीजू पास में खड़ा कपड़े फोल्ड कर रहा था। उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा,
“आज हमें सेक्स करते-करते पूरे तीन साल हो गए। तीन साल पहले कितनी डरती थी तू… और आज फुल मजे करती है।”
दीदी ने सिर हिलाया,
“वो तो है।”
मैं उनकी बातें सुनकर अंदर तक चौंक गई। इतनी खुलकर, मेरे सामने… तीन साल पहले की बात और आज की तुलना। जीजू आगे बोला,
“तुझे पता है ना, आज से हम बिना कंडोम के सेक्स करेंगे। बेबी प्लानिंग के लिए।”
दीदी ने मेरी तरफ देखा और हल्के स्वर में बोली,
“हम में कैसे बुला सकती हूँ…” फिर वो रुक गई।
मैं चुपचाप खड़ी सोच रही थी — अगर आज से बिना कंडोम के करना है तो इतने सारे कंडोम क्यों लाए हैं? बैग में पैकेट के पैकेट भरे थे। मैं कुछ पूछ नहीं पाई।
जीजू ने बात आगे बढ़ाई,
“आज रात सेलिब्रेट करेंगे। पूरी रात। तू भी करेगी ना?”
मैंने बिना सोचे-समझे सिर हिला दिया,
“हाँ।”
थोड़ी देर बाद दीदी ने कहा,
“थक गए होंगे सब। पूरी रात जागना है। चोटी, थोड़ा आराम कर ले। बाद में आ जाना।”
मैं बाहर लिविंग वाले हिस्से में चली गई। थोड़ी देर आराम किया। शाम को तीनों ने साथ डिनर किया। हल्का-फुल्का खाना। बातें सामान्य रहीं। रात के ग्यारह बजे तक सबकी आँखें भारी हो गईं। एक बड़े सोफे पर ही सोने का इंतजाम हुआ। जीजू बीच में, एक तरफ दीदी, दूसरी तरफ मैं। तीनों सो गए
शाम होते-होते रूम डेकोरेशन वाले आ गए। उन्होंने पूरे विला को सजा दिया — गुलाब की पंखुड़ियाँ, हल्की रोशनी, बैलून और एनिवर्सरी के बैनर। जब वो लोग गए तो शाम के सात बज चुके थे।

जीजू ने कहा, “तुम दोनों तैयार हो जाओ।”

दीदी ने अपने बैग से एक छोटा सा सेक्सी ड्रेस निकाला और मुझे दिया। काला, टाइट और काफी छोटा। मैंने पहन लिया तो कंधे और जाँघें काफी खुली लग रही थीं। दीदी ने खुद एक ऐसी ब्रा पहनी जिसमें उसके बड़े स्तन साफ उभर रहे थे, और नीचे सेक्सी पैंटी। वो बिल्कुल बिना हिचक के तैयार हो गई। मुझे देखकर शर्म आ रही थी, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।

थोड़ी देर में डिनर आ गया। जीजू सिर्फ शॉर्ट्स में थे। हम तीनों ने साथ में खाना खाया। माहौल हल्का लेकिन अजीब सा था। खाना खत्म होते ही एक बड़ा सा केक कमरे में आ गया। उस पर एनिवर्सरी लिखा था।

जीजू ने मुझे कैमरा पकड़ा दिया और बोला, “ले।”

दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“तू पूरा शूट करना। आज का सेलिब्रेशन। सब कुछ रिकॉर्ड करना है।”

मैंने कैमरा हाथ में लिया। दिल तेज धड़क रहा था। कमरे में सजी-धजी रोशनी, केक, और तीनों का यह अजीब सा सेटअप… सेलिब्रेशन शुरू होने वाला था।

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